➡️बिना किसी ठोस साक्ष्य के दर्ज प्राथमिकी पर लोग उठा रहे हैं सवाल
➡️एफआईआर की निष्पक्ष, तथ्यपरक और व्यक्ति-आधारित जांच की मांग हुई तेज

समाचार विचार/खगड़िया: खगड़िया जिले के गंगौर थाना क्षेत्र में मासूम बच्ची की दुष्कर्म के बाद हुई हत्या के उपरांत हाल ही में दर्ज दो अलग–अलग एफआईआर में कई सामाजिक–राजनीतिक व्यक्तित्वों के साथ-साथ कई निर्दोष लोगों के नाम शामिल किए जाने को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। नगर परिषद खगड़िया के नगर सभापति प्रतिनिधि ज्योतिष मिश्रा, जिला परिषद सदस्य रजनीकांत कुमार, भाजपा जिला प्रवक्ता मनीष चौधरी तथा भाजपा नेता रविशंकर कुमार का नाम कांडों में जोड़े जाने के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। परिजनों और समर्थकों का आरोप है कि कार्रवाई में व्यक्तिगत भूमिका की जांच किए बिना सामूहिक रूप से नाम जोड़ दिए गए, जिससे कई ऐसे लोग भी एफआईआर में फँस गए, जिनका घटनाओं से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं बताया जा रहा है।
आखिर चुनिंदे व्यक्तियों तक क्यों सीमित रही कार्रवाई
ज्योतिष मिश्रा के मामले में बताया जा रहा है कि उन्होंने संबंधित घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक संवेदनशील और संयमित अपील साझा की थी, जिसमें न तो किसी पीड़िता का नाम, फोटो या वीडियो शामिल था और न ही कोई आपत्तिजनक टिप्पणी की गई थी। इसके उलट, पोस्ट में पुलिस प्रशासन की त्वरित कार्रवाई की सराहना करते हुए आरोपी की शीघ्र गिरफ्तारी को सराहनीय बताया गया था। इसके बावजूद एफआईआर में उनका नाम जोड़े जाने पर यह सवाल उठ रहा है कि जब सैकड़ों सोशल मीडिया यूज़र, नामी यूट्यूबर और डिजिटल न्यूज़ पोर्टल सक्रिय थे, तब कार्रवाई केवल चुनिंदा व्यक्तियों तक ही क्यों सीमित रही?

बिना किसी ठोस साक्ष्य के दर्ज प्राथमिकी पर लोग उठा रहे हैं सवाल
वहीं जिला परिषद सदस्य रजनीकांत कुमार के संबंध में परिजनों का कहना है कि समाहरणालय परिसर में हुए हंगामा–उपद्रव के समय वे घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे, बल्कि अपर पुलिस अधीक्षक एवं गंगौर थाना प्रभारी के अनुरोध पर पीड़िता की माता को लेकर गंगौर थाना परिसर में उपस्थित थे, जिसकी पुष्टि थाना परिसर में लगे सीसीटीवी फुटेज और संबंधित पदाधिकारियों के बयान से की जा सकती है। इसके बावजूद उनका नाम चित्रगुप्त नगर थाना कांड में शामिल होना कई सवाल खड़े करता है। इसी क्रम में भाजपा जिला प्रवक्ता मनीष चौधरी के संबंध में परिजनों का कहना है कि घटना के समय वे घटनास्थल पर नहीं थे, बल्कि खगड़िया मेन रोड स्थित आर्किटेक्ट शुभम जी की दादी के अंतिम संस्कार में शामिल थे और बाद में अपने ग्राम रहीमपुर में पंचायत स्तर की बैठक में उपस्थित रहे। उनका आरोप है कि बिना किसी ठोस साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शी या विशिष्ट भूमिका के उनका नाम भी कांड में जोड़ दिया गया।
जोरों पर है राजनीतिक प्रभाव में आकर सामूहिक नामजदगी की चर्चा
सबसे महत्वपूर्ण दावा भाजपा नेता रविशंकर कुमार को लेकर सामने आया है। समर्थकों का कहना है कि घटना के दिन वे पटना स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में माननीय उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ उपस्थित थे, इसके बावजूद उनका नाम भी संबंधित एफआईआर में दर्ज कर दिया गया। इस तथ्य के सामने आने के बाद यह सवाल और गहरा गया है कि क्या नामजदगी से पहले उपस्थिति, साक्ष्य और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया था या नहीं। स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि दोनों एफआईआर में केवल इन प्रमुख नामों ही नहीं, बल्कि कई सामान्य नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम भी शामिल हैं, जिनके बारे में दावा किया जा रहा है कि वे न तो घटनास्थल पर मौजूद थे और न ही किसी उपद्रव या अवैध गतिविधि में उनकी कोई भूमिका थी। इससे यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं भीड़, दबाव या राजनीतिक प्रभाव में आकर सामूहिक नामजदगी तो नहीं कर दी गई।
एफआईआर की निष्पक्ष, तथ्यपरक और व्यक्ति-आधारित जांच की मांग हुई तेज
परिजनों एवं समर्थकों ने पुलिस प्रशासन से मांग की है कि दोनों एफआईआर की निष्पक्ष, तथ्यपरक और व्यक्ति-आधारित जांच कराई जाए तथा जो लोग निर्दोष पाए जाएँ, उनके नाम कांडों से हटाए जाएँ, ताकि आमजन का पुलिस प्रशासन पर विश्वास बना रहे और सुशासन की छवि धूमिल होने से बच सके। फिलहाल इन प्रकरणों पर पुलिस प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा की जा रही है, जबकि जिले की राजनीति और आम जनता के बीच यह मुद्दा लगातार चर्चा और बहस का विषय बना हुआ है।














